स्वाधीनता आंदोलन के नायक रहे बेल्हा के सपूत - Pratapgarh Samachar

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बुधवार, 16 अगस्त 2017

स्वाधीनता आंदोलन के नायक रहे बेल्हा के सपूत

देश की आजादी में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले का योगदान अमूल्य रहा है। इसे कोई भी कभी भुला नहीं सकता। बेल्हा में 1857 के संग्राम से लेकर 1947 में आजादी तक अंग्रेजों की यातना के खिलाफ प्रतापगढ़ी वीर सपूतों के हौसले का गवाह है। प्रतापगढ़ जवाहर लाल नेहरू, पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय, राजाराम किसान, बाबा राम चन्द्र, शहीद कुंवर लाल प्रताप सिंह, बाबु गुलाब सिंह, बाबु मेंदिनी सिंह, जैसे अनेक महान स्वतंत्रा संग्राम सेनानियों और क्रांतिकारियों ने आजादी की अलख जलाई थी। बेल्हा के महामना कहे जाने वाले एक मात्र पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय ही हैं जिनका हस्ताक्षर देश के संविधान में है।

१८५७ की क्रांति में कालाकांकर के वीर शहीद कुंवर लाल प्रताप सिंह
१८५७की क्रांति के दौरान जब इलाहाबाद व उसके निकटवर्ती के क्षेत्रों में भारी दमनराज चलाने के बाद घमंड से भरा जनरल नील जब सुल्तानपुर के रास्ते लखनऊ की तरफ जा रहा था, तब अवध की बेगम हजरत महल ने प्रतापगढ़ के कालाकांकर नरेश और अमेठी नरेश राजा लाल माधव को उसकी सेना को रोकने का संदेश भेजा। तब नील लखनऊ रेजीडेंसी को मुक्त कराने के उद्देश्य से बहुत बड़ी सैन्य शक्ति के साथ जा रहा था।

शहीद लाल प्रताप सिंह
इस मौके पर कालाकांकर नरेश ने अपने प्रिय बेटे कुंवर लालप्रताप सिंह को चाँदा की घेराबंदी कर अंग्रेजों से मुकाबला करने का जिम्मा दिया। युवराज लाल प्रताप ने अपने संग सैनिको तथा भरी संख्या में अपने समर्थक दिलेर किसानो के साथ सन १८५७ के अक्टूबर में मोरचे पर पहुँच गये। बागियों ने चाँदा और अमेठी में ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध प्रचंड मोरचा लिया। चाँदा फतह करने के प्रयोजन से ब्रिटिश बड़े ताम-झाम एवं सैनिक तैयारी के साथ निकले थे। मगर चाँदा की लड़ाई उनके लिए वाटरलू का युद्ध जैसी होती दिखी। इस लड़ाई में अंग्रेजों की नानी याद आ गई और उनको बुरी तरह हारना गए। इस हार से अंग्रेज बहुत घबरा गये। वहीँ बागियों ने जीत के बाद भी सावधानी बरकरार रखी तथा चाँदा को अपना मजबूत किला बनाए रखा। ब्रिटिश के विरुद्ध युद्ध में चाँदा का मोरचा अवध का ऐतिहासिक मोर्चा माना जाता है।
मौजूद दस्तावेजों के अनुसार १८ फ़रवरी १८५८ को चाँदा की लड़ाई में बीस हजार से ज्यादा स्वातंत्र्य वीरों ने भाग लिया था। जिसमे पैदल सिपाही पच्चीस हज़ार और सवार चौदह हज़ार के करीब थे। बाकी जंग में सम्मिलित होने पहुंचे क्षेत्रीय किसान व मजदूर थे। उनके पास उस समय तोप जैसी उन्नत हथियार होने के बजाय लाठी, बल्लम, भाला जैसे परंपरागत हथियार और कइयों के पास तलवारे थी। 

परन्तु चाँदा की लड़ाई में बागी नेताओं के पास अलग-अलग श्रेणी की २३ तोपें भी थीं। इन सारी तैयारियों बाकायदा जायजा लेकर इस बार हमला ब्रिटिश ने सभी तरीको को अख्तियार करके किया। इस बार अंग्रेजों की कुटिल नीति और खुफिया तैयारियों के कारण बागियों की हार हुई। दिनांक १९ फ़रवरी १८५८ को चाँदा की लड़ाई में बेल्हा के महान सपूत युवराज लाल प्रताप सिंह की हुई शहादत क्रांतिकारियों की सबसे भारी क्षति साबित हुई। यही नहीं चाँदा की ऐतिहासिक लड़ाई में युवराज लाल प्रताप सिंह के चाचा अमेठी नरेश राजा माधव सिंह भी लड़ते -लडते मातृ-भूमि पर शहीद हो गए। उन्होने केवल २६ वर्ष की कम आयु में ऐतिहासिक चाँदा की लड़ाई में अपने प्राणों का बलिदान हंसते-हंसते दे दिया था। इस महान नायक की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए उनके शहादत तिथि १९ फ़रवरी २००९ को भारत के डाक विभाग ने एक विशेष स्मारक डाक टिकट एवं प्रथम दिवस आवरण जारी किया।

१८५७ के दो क्रांतिकारी भाई गुलाब और मेंदिनी
तरौल (तारागढ़) के जमींदार बाबू गुलाब सिंह और मेंदिनी सिंह ने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। ब्रिटिश

सेना जब छितपालगढ़ से तारागढ़ (आज का तरौल) पर चढ़ाई की तो बाबू गुलाब सिंह और उनके भाई बाबू मेंदिनी सिंह ने कई हफ़्तों तक फिरंगियों से लोहा लिया। हालाकि इस बात इस वो भलीभांति परिचित थे कि अंग्रेजो की सेना के सामने लड़ने का मतलब खुद मौत के मुँह में जाना है, लेकिन फिर भी भारत के सपूतों ने आखिरी समय तक किले के आस-पास ब्रिटिश सेना को पहुँचने तक नहीं दिया। जब इलाहाबाद से लखनऊ ब्रिटिश सैनिक क्रांतिकारियों के दमन के लिए जा रहा था। उस समय उन्होंने उन्होंने अपनी निजी सेना के साथ बेल्हा के दक्षिण अंचल में स्थित वर्तमान कटरा गुलाब सिंह के निकट बकुलाही नदी पर घमासान लड़ाई करके कई अंग्रेजों को मार डाला था। नदी का पानी फिरंगियों के खून से लाल हो गया था। मजबूरन दुश्मनों की सेना को वापस लौटना पड़ा था। हालांकि इस घमासान युद्ध में किले पर अंग्रेज सैनिकों ने उनके कई सिपाही के साथ उनकी रानियों को गोलियों से छल्ली कर डाला था। अंग्रेजो से मुठभेड़ में बाबू गुलाब सिंह और मेंदिनी सिंह गंभीर रूप से जख्मी हुए थे। उचित उपचार न मिलने पर में तीसरे दिन वह वीर गति को प्राप्त हो गए। ऐसे महान क्रांतिकारी की न तो कहीं समाधि बन पाई और न ही कोई स्मृति स्मारक। इन दोनों भाइयों के नाम पर ही जिले का कटरा गुलाब सिंह और कटरा मेंदिनीगंज बसाया गया है।

बेल्हा में रखी गई किसान आन्दोलन की नींव
सन १९१८ का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन की नींव यही प्रतापगढ़ में रखी गई. होमरूल लीग के वर्कर्स के
पं० मुनीश्वर दत्त उपाध्याय
प्रयास और इन्द्र नारायण द्विवेदी, गौरीशंकर मिश्र तथा पंडित मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणाम स्वरुप सन १९१८ के फरवरी माह में उत्तर प्रदेश में किसान सभा का गठन हुआ। सन १९१९ के आखिरी दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। प्रतापगढ़ जिले की एक रियासत में 'नाई धोबी बंद' सामाजिक बहिष्कार संगठित कार्रवाई की प्रथम घटना थी। अवध की तालुकेदारी में ग्राम पंचायतों के मार्गदर्शन में किसान बैठकों का सिलसिला प्रारंभ हो गया। इसमें झिंगुरीपाल सिंह, पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय और रामराम शुक्ल और दुर्गपाल सिंह आदि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की । लेकिन शीघ्र
ही एक चेहरे के रूप में बाबा रामचन्द्र उभर कर सामने आए। उत्तर प्रदेश के इस प्रसिद्ध किसान आन्दोलन को सन १९२० के दशक में सबसे ज्यादा मजबूती स्वतंत्रता सेनानी बाबा रामचन्द्र ने प्रदान की। उनके निजी प्रयासों से ही दिनांक १७ अक्टूबर, १९२० ई. को जनपद प्रतापगढ़ में अवध किसान सभा का स्थापना किया गया। जनपद का खरगाँव किसान सभा की गतिविधियों का मुख्य केन्द्र था। इस संगठन को पंडित जवाहरलाल नेहरू, गौरीशंकर मिश्र, केदारनाथ, माता बदल पांडे आदि सपूतों ने अपने सहयोग से आन्दोलन को शक्ति प्रदान की।

महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन की अलख बेल्हा में जगाई थी
अहिंसा के मार्ग पर चलकर देश को आजाद कराने वाले महात्मा गाँधी का नाम आते ही प्रतापगढ़ वासियों में उनकी स्मृति ताजा हो जाती है। वैसे तो बापू दो बार यहाँ आए और लोगों में देश को आजाद कराने का जज्बा जगाया। प्रतापगढ़ में पहले से ही किसान आंदोलन चल रहा था। स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान साल १९१७ में पट्टी में बाबा रामचंद्र के मार्गदर्शन में चलाया जा रहा था। बापू को लगा कि कृषको के सहयोग से अंग्रेजी हुकूमत को देश से शीघ्र भगाया जा सकता है। दिनांक २९ नवंबर, साल १९२० प्रतापगढ़ शहर आना हुआ, उनके साथ पंडित मोती लाल नेहरू मौलाना अबुल कलाम आजाद सौकत अली खान भी संग थे। यहाँ उन्होंने अपने मित्र इंद्र नारायण चड्ढा के घर पर कुछ वक्त ठहरने के बाद स्टेशन क्लब स्थित मैदान में जनसभा को संबोधित कर रहे थे। उस वक्त जिलाधिकारी बी०एन० मेहता थे। उनसे मिलने महात्मा गाँधी पैदल ही उनके घर तक गए।


बापू ने जिले में जलाई थी विदेशी कपड़ों की होली
कालाकांकरमें राजा अवधेश सिंह के साथ महात्मा गाँधी
यदि बात आज़ादी के आंदोलन की हो और प्रतापगढ़ के कालाकांकर का उल्लेख न हो तो बात मुकम्मल नही होगी। कालाकांकर राजभवन का स्वतंत्रता की लड़ाई में गौरवशाली इतिहास रहा है। दिनांक १४ नवंबर सन १९२९ को महात्मा गाँधी जब दूसरी बार बेल्हा आये तो उन्होंने कालाकांकर नरेश राजा अवधेश सिंह के संग गांधी चबूतरे पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। वहां गांधी चबूतरा आज भी जीवंत है।




बेल्हा के इस सपूत ने झेली कठोर यातनाये
राजाराम किसान
बेल्हा के स्वतंत्रता सेनानियों मे से एक थे पंडित राजाराम शुक्ल किसान जिन्होंने साल १९३०-१९३१ में अपने मित्रों के साथ हरिद्वार सिंह, दया शंकर सिंह, बैजनाथ गुप्ता के संग रेहुआलालगंज में नमक बनाने का प्रयास किया तो अंग्रेजी उन्हें यातना देकर रायबरेली के कारावास में ठूंस दिया। लगभग ३ महीने के बाद जेल से सजा काट कर जब यह देशभक्त बाहर आया तो केवल यह चिंता थी कि किस प्रकार अंग्रेजी हुकूमत को मातृभूमि से बाहर किया जाये। जब राजाराम किसानों को संगठित कर रहे थे तो अंग्रेजों को इसकी भनक मिल जाती थी। जिसके बाद गिरफ्तार कर उनके साथ जानवरों जैसा सुलूक किया जाता था। दिंनाक १४ नवंबर, १९४०को जब वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिन पर किसान हित में भाषण दे रहे थे तो उन्हें नौ महीने की कारावास की सजा दी गई। आज़ादी के बाद वें रामपुर ख़ास से प्रथम  विधायक बने।